Rinku Singh father Death News: भारतीय क्रिकेटर रिंकू सिंह के पिता खचंद्र सिंह का निधन खेल जगत के लिए भावुक कर देने वाली खबर है। स्टेज-4 लिवर कैंसर से लंबी जंग के बाद उन्होंने नोएडा के यथार्थ अस्पताल में अंतिम सांस ली। परिवार के लिए यह सिर्फ एक व्यक्तिगत क्षति नहीं, बल्कि उस मजबूत साए के चले जाने जैसा है जिसने संघर्ष के दिनों में घर को संभाले रखा।
मेहनत से बनी थी नींव
अलीगढ़ की गलियों में एलपीजी गैस सिलेंडर की सप्लाई करते हुए खचंद्र सिंह ने अपनी पूरी जिंदगी मेहनत में बिताई। सीमित आय, बड़ा परिवार और रोज की जद्दोजहद—यह सब उनकी दिनचर्या का हिस्सा था। कई बार हालात ऐसे बने कि रिंकू को भी पिता के साथ सिलेंडर पहुंचाने जाना पड़ा।

लेकिन इन्हीं हालातों के बीच क्रिकेट का सपना भी पल रहा था। परिवार में संसाधन कम थे, मगर उम्मीदें बड़ी थीं। पिता ने सख्ती जरूर दिखाई, पर बेटे के सपने को पूरी तरह कभी नहीं रोका।
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सख्त पिता, गहरा असर
रिंकू सिंह कई इंटरव्यू में बता चुके हैं कि उनके पिता खुलकर तारीफ नहीं करते थे। मैच देखने भी कम ही जाते थे। पर यह दूरी उदासीनता नहीं थी, बल्कि जीवन का व्यावहारिक पाठ था।
उनकी सोच साफ थी—चाहे क्रिकेट खेलो या कोई और काम करो, अनुशासन और मेहनत से समझौता मत करो। आज रिंकू के खेल में जो संयम और शांत आत्मविश्वास दिखाई देता है, उसकी जड़ें इसी परवरिश में हैं।
बीमारी के बीच भी बेटे पर गर्व
कुछ महीनों पहले, एक समाचार एजेंसी से बातचीत में खचंद्र सिंह ने कहा था कि बेटे को अच्छा खेलते देख उनकी तबीयत तक सुधर जाती है। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा था—“लौंडे ने तबीयत खुश कर दी।”
बीमारी के बावजूद मैच देखना, बेटे की पारी पर गर्व करना—यह वही भाव था जो किसी भी पिता की आंखों में दिखता है, चाहे वह मंच पर दिखाई दे या नहीं।
अस्पताल के कठिन दिन
डॉक्टरों के अनुसार, Rinku Singh father खचंद्र सिंह की हालत पिछले कुछ दिनों से गंभीर थी। वे मैकेनिकल वेंटिलेटर सपोर्ट पर थे और उन्हें रीनल रिप्लेसमेंट थेरेपी दी जा रही थी। स्थिति लगातार नाजुक बनी हुई थी।
रिंकू सिंह ने टीम इंडिया के अभ्यास सत्र से दूरी बनाकर नोएडा पहुंचना चुना। चेन्नई में एमए चिदंबरम स्टेडियम में चल रहे प्रैक्टिस सेशन में उनकी गैरमौजूदगी ने संकेत दे दिया था कि परिवार पर मुश्किल वक्त है।
मैदान से दूर रहने का फैसला

टी20 टूर्नामेंट के दौरान रिंकू ग्रुप स्टेज मुकाबलों का हिस्सा रहे थे। लेकिन Rinku Singh father की तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें बीच में घर लौटना पड़ा। जिंबाब्वे के खिलाफ मुकाबले में वे टीम का हिस्सा नहीं बन पाए।
एक खिलाड़ी के लिए राष्ट्रीय टीम से जुड़ा हर पल अहम होता है, लेकिन उस वक्त रिंकू ने बेटे की भूमिका को खिलाड़ी से ऊपर रखा।
एक पीढ़ी का मौन संघर्ष
Rinku Singh father खचंद्र सिंह का जीवन उस पीढ़ी की कहानी कहता है, जो अपने सपनों को पीछे रखकर अगली पीढ़ी के लिए रास्ता बनाती है। मंच पर नाम बेटे का होता है, लेकिन नींव अक्सर पिता की अनदेखी मेहनत से तैयार होती है।
आज जब रिंकू सिंह के बल्ले से छक्के निकलते हैं और स्टेडियम तालियों से गूंज उठता है, तो उन तालियों में एक पिता की खामोश तपस्या भी शामिल होती है।
निष्कर्ष
Rinku Singh father खचंद्र सिंह का जाना सिर्फ एक परिवार की क्षति नहीं है। यह हमें याद दिलाता है कि हर चमकती सफलता के पीछे किसी की अनदेखी मेहनत होती है। रिंकू सिंह के लिए यह दुख का समय है, लेकिन उनके पिता की सीख—मेहनत, अनुशासन और धैर्य—शायद आगे की राह में सबसे बड़ी ताकत बनेगी।
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Abhay Singh TrickyKhabar.com के एक दक्ष और मल्टी-टैलेंटेड कंटेंट राइटर हैं, जो हेल्थ, गैजेट्स, शायरी और सरकारी योजनाओं जैसे विविध विषयों पर लिखते हैं। Abhay का फोकस हमेशा इस बात पर रहता है कि पाठकों को सरल, सटीक और उपयोगी जानकारी मिले — वो भी एक ऐसी भाषा में जो दिल से जुड़े।








