राजस्थान सरकार की नई पहल ‘Gaon Gwala Yojana’ इन दिनों ज़मीनी स्तर पर चर्चा का विषय बनी हुई है। वजह सिर्फ़ गाय चराने के लिए लोगों की नियुक्ति नहीं है, बल्कि इसके पीछे छिपा वह बड़ा सामाजिक प्रयोग है, जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था, पारंपरिक पशुपालन व्यवस्था और सामुदायिक भागीदारी—तीनों को एक साथ जोड़ने की कोशिश करता है।
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कहां से हुई शुरुआत?
राज्य के शिक्षा मंत्री मदन दिलावर ने कोटा जिले की रामगंजमंडी विधानसभा क्षेत्र के चेचट तहसील स्थित खेड़ली गांव से इस योजना की शुरुआत की। शुरुआती चरण में 14 गांवों में एक-एक ‘गांव ग्वाला’ नियुक्त किया गया है। कार्यक्रम के दौरान इन नव-नियुक्त ग्वालों का साफा और माला पहनाकर सम्मान भी किया गया—जो यह संकेत देता है कि सरकार इसे महज़ नौकरी नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी के रूप में पेश करना चाहती है।

क्या है Gaon Gwala Yojana का मूल उद्देश्य?
सरकार के मुताबिक, इस पहल का मकसद प्राचीन गोचारण परंपरा को फिर से जीवित करना है। गांवों में पहले सामूहिक रूप से पशुओं को चराने की व्यवस्था होती थी, जिससे न सिर्फ़ पशुओं की देखभाल बेहतर होती थी बल्कि खेतों और गांव की व्यवस्था भी संतुलित रहती थी। बदलते समय के साथ यह परंपरा धीरे-धीरे खत्म हो गई, जिसका असर पशुपालन और ग्रामीण जीवनशैली दोनों पर पड़ा।
Gaon Gwala Yojana के तहत नियुक्त ग्वालों का काम होगा कि वे गांव की गायों को सुबह सामूहिक रूप से गोचर भूमि तक ले जाएं, पूरे दिन उनकी देखभाल करें और शाम को सुरक्षित वापस घरों तक पहुंचाएं। इससे आवारा पशुओं की समस्या पर भी कुछ हद तक नियंत्रण मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।
कैसे होगा चयन और भुगतान?
सरकारी जानकारी के अनुसार, हर 70 गायों पर एक ग्वाला नियुक्त किया जाएगा। यदि किसी गांव में गायों की संख्या अधिक है, तो वहां दो या तीन ग्वाले भी लगाए जा सकते हैं। प्रत्येक नियुक्त ग्वाले को 10,000 रुपये प्रतिमाह मानदेय दिया जाएगा।
हालांकि Gaon Gwala Yojana की एक खास बात यह है कि ग्वालों का मानदेय सीधे सरकारी खजाने से नहीं आएगा। इसे भामाशाहों और स्थानीय दानदाताओं के सहयोग से जुटाया जाएगा। यानी यह मॉडल पूरी तरह सामुदायिक सहभागिता पर आधारित है—जहां गांव के लोग ही अपने पशुधन की देखभाल के लिए संसाधन जुटाएंगे।
क्या बदल सकता है ज़मीनी हालात?
ग्रामीण क्षेत्रों में पशुपालन आज भी कई परिवारों की आय का अहम स्रोत है, लेकिन चराई की व्यवस्था और निगरानी की कमी अक्सर किसानों के लिए परेशानी बन जाती है। ऐसे में ‘गांव ग्वाला’ जैसी भूमिका न सिर्फ़ रोजगार का एक नया विकल्प खोल सकती है, बल्कि खेतों में फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले आवारा पशुओं की समस्या को भी कम कर सकती है।
स्थानीय स्तर पर यह पहल युवाओं को गांव में ही काम के अवसर देने की दिशा में एक छोटा लेकिन महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है—खासतौर पर उन इलाकों में जहां पलायन लगातार बढ़ रहा है।
निष्कर्ष
‘Gaon Gwala Yojana’ पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक प्रशासन के बीच एक दिलचस्प सेतु बनाने की कोशिश है। इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि स्थानीय समुदाय इसमें कितनी सक्रिय भागीदारी निभाता है। अगर गांव खुद इस जिम्मेदारी को अपनाते हैं, तो यह पहल सिर्फ़ गायों की देखभाल तक सीमित नहीं रहेगी—बल्कि ग्रामीण जीवन में सामूहिकता की खोती हुई भावना को भी फिर से मजबूत कर सकती है।
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