भारत और अमेरिका के बीच घोषित अंतरिम व्यापार समझौते ने कृषि क्षेत्र को लेकर नई बहस छेड़ दी है। सरकार इसे किसानों के हितों की रक्षा करते हुए निर्यात बढ़ाने वाला कदम बता रही है, वहीं कुछ किसान संगठन सतर्क हैं। India US Trade Deal Farmers के संदर्भ में सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या यह संतुलित सौदा है?
‘रिंग-फेंसिंग’ रणनीति क्या है?
सरकार ने साफ किया है कि संवेदनशील कृषि क्षेत्रों को पूरी तरह सुरक्षित रखा गया है। गेहूं, चावल, मक्का, दालें, तेलहन और चीनी जैसे प्रमुख अनाजों पर किसी तरह की टैरिफ छूट नहीं दी गई।
डेयरी सेक्टर—दूध, घी, मक्खन, पनीर—भी पूरी तरह संरक्षित है। यही नहीं, पोल्ट्री और मांस उत्पादों को भी अमेरिकी बाज़ार पहुंच से बाहर रखा गया है। सरकार के मुताबिक, इससे घरेलू किसानों पर सस्ती आयातित वस्तुओं का दबाव नहीं पड़ेगा।
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जीएम फसलों पर सख्त रुख
समझौते के साथ यह भी स्पष्ट किया गया है कि भारत में जेनेटिकली मॉडिफाइड (GM) खाद्य फसलों को अनुमति नहीं दी जाएगी। यह संदेश खासतौर पर उन किसानों के लिए अहम है जो बीज और खाद्य सुरक्षा को लेकर चिंतित रहते हैं।
निर्यात के लिए खुले दरवाज़े

दूसरी ओर, अमेरिका ने भारतीय कृषि और बागान उत्पादों पर शून्य शुल्क की पेशकश की है। चाय, कॉफी, मसाले, नारियल उत्पाद, काजू और कुछ अनाजों को बड़ा बाजार मिलने की उम्मीद है।
फल-सब्जियों—जैसे आम, अमरूद, पपीता और अनानास—के लिए भी रास्ता आसान होगा। प्रोसेस्ड फूड जैसे जूस, जैम और बेकरी उत्पादों को भी लाभ मिल सकता है। व्यापार मंत्रालय के अनुसार, यह कदम भारतीय किसानों को उच्च मूल्य वाले बाजार तक पहुंच दिला सकता है।
किन क्षेत्रों में चिंता?
हालांकि मुख्य फसलें सुरक्षित हैं, लेकिन कुछ अमेरिकी उत्पादों के लिए सीमित कोटा खोला गया है। खासकर पशु चारे में इस्तेमाल होने वाले DDGS और रेड सॉरघम पर रियायतें दी गई हैं। सरकार का तर्क है कि इससे घरेलू पोल्ट्री और पशुपालन उद्योग की लागत घटेगी।
सोयाबीन तेल और कुछ प्रीमियम ड्राई फ्रूट्स पर शुल्क में संभावित कमी भी चर्चा में है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे खाद्य तेल बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है, जिसका असर स्थानीय उत्पादकों पर पड़ेगा।
राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रिया

केंद्रीय मंत्रियों ने इसे “दोनों देशों के लिए लाभकारी” बताया है और कहा है कि ‘अन्नदाता’ की सुरक्षा प्राथमिकता रही है।
हालांकि संयुक्त किसान मोर्चा जैसे संगठनों ने आशंका जताई है कि सीमित रियायतें भी भविष्य में बड़े दबाव का कारण बन सकती हैं। उनका कहना है कि यदि आगे चलकर पूर्ण मुक्त व्यापार समझौता (FTA) होता है, तो छोटे किसानों पर असर पड़ सकता है।
बड़ा बाजार, बड़ी चुनौती
अमेरिका करीब 30 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था है। वहां भारतीय कृषि उत्पादों की मांग बढ़ना किसानों के लिए बड़ा अवसर हो सकता है। लेकिन वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा आसान नहीं होती—गुणवत्ता, मानक और आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करना भी उतना ही जरूरी है।
निष्कर्ष- India US Trade Deal Farmers
India US Trade Deal Farmers के संदर्भ में यह समझौता संतुलन साधने की कोशिश जैसा दिखता है—एक ओर घरेलू सुरक्षा, दूसरी ओर निर्यात विस्तार।
अंततः यह इस बात पर निर्भर करेगा कि सरकार निगरानी और समर्थन तंत्र को कितना मजबूत रखती है। अगर सुरक्षा और अवसर दोनों साथ चलते रहे, तो यह सौदा किसानों के लिए नई संभावनाओं का द्वार खोल सकता है। लेकिन सतर्कता और पारदर्शिता भी उतनी ही अहम रहेगी।
Disclaimer: यह रिपोर्ट आधिकारिक घोषणाओं और उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी पर आधारित विश्लेषण है। अंतिम नीतिगत बदलाव और लागू शर्तों के अनुसार विवरण में परिवर्तन संभव है।
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Abhay Singh TrickyKhabar.com के एक दक्ष और मल्टी-टैलेंटेड कंटेंट राइटर हैं, जो हेल्थ, गैजेट्स, शायरी और सरकारी योजनाओं जैसे विविध विषयों पर लिखते हैं। Abhay का फोकस हमेशा इस बात पर रहता है कि पाठकों को सरल, सटीक और उपयोगी जानकारी मिले — वो भी एक ऐसी भाषा में जो दिल से जुड़े।








